मुजफ्फरपुर। “या कुन्देन्दु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता…” के पावन मंत्रों से आज मुजफ्फरपुर की हवाएं भक्तिमय हो चुकी हैं। ज्ञान, विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती की आराधना में पूरा शहर डूबा हुआ है। लेकिन इस भक्ति के सागर में शास्त्री नगर स्थित खादी भंडार की चित्रगुप्त मंदिर वाली गली एक विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहाँ की सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक कलाकार की अनूठी साधना और बंगाल की जीवंत परंपरा का संगम है।
2001 से अनवरत: श्रद्धा और समर्पण का सफर
इस भव्य आयोजन की नींव वर्ष 2001 में रखी गई थी। जाने-माने कलाकार राहुल कुमार द्वारा शुरू की गई यह पूजा आज दो दशकों से अधिक का सफर तय कर चुकी है। राहुल कुमार के लिए यह केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं है, बल्कि उनकी कलात्मक तपस्या है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा और कौशल माँ सरस्वती के चरणों में समर्पित कर दिया है।
स्वयं कलाकार करते हैं माँ का साज-सिंगार
इस पूजा की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि आयोजक राहुल कुमार स्वयं अपने हाथों से माँ सरस्वती की प्रतिमा का साज-सिंगार करते हैं। एक कलाकार के रूप में उनकी बारीकियां प्रतिमा में प्राण फूंक देती हैं।
- अलंकरण: गहनों से लेकर माता के वस्त्रों तक, सब कुछ शुद्ध बंगाली शैली में होता है।
- थीम: इस वर्ष भी पूरे पूजा पंडाल को ‘शुद्ध बंगाली थीम’ पर सजाया गया है।
- सांस्कृतिक छटा: प्रतिमा की बनावट, पुष्प-सज्जा और साज-सज्जा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे बंगाल की कोई प्राचीन सांस्कृतिक गली शास्त्री नगर में उतर आई हो।

चार दिवसीय अनुष्ठान: भक्ति और सेवा का संगम
शास्त्री नगर की यह पूजा चार दिनों तक चलती है, जिसमें हर दिन का अपना एक विशेष महत्व होता है। आयोजन में श्रद्धा के साथ-साथ सामाजिक समरसता का भी अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है।
मुख्य आकर्षण:
- भव्य आरती: संध्या काल में होने वाली आरती के समय ढाक (बंगाली ढोल) की थाप और शंख की ध्वनि से पूरा वातावरण गूंज उठता है। भक्तों की भारी भीड़ माँ के इस मनोहारी दर्शन के लिए उमड़ पड़ती है।
- सांस्कृतिक जागरण: माँ की महिमा का बखान करने के लिए विशेष जागरण का आयोजन किया जाता है, जिसमें स्थानीय कलाकार भजनों की प्रस्तुति देते हैं।
- विशाल भंडारा: पूजा के अंतिम चरणों में भव्य भंडारे का आयोजन होता है। इसमें माता को अर्पित किए गए प्रसाद जैसे बूंदिया, खीर, और खिचड़ी का वितरण श्रद्धालुओं के बीच किया जाता है।
परंपरा को जीवंत रखने की ‘साधना’
आयोजक राहुल कुमार का कहना है कि आज के आधुनिक दौर में हमारी प्राचीन परंपराएं कहीं खोती जा रही हैं। उन्होंने बताया:
“यह पूजा मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं बल्कि एक साधना है। मेरा उद्देश्य है कि मुजफ्फरपुर की मिट्टी में बंगाली परंपरा और संस्कृति की मिठास बनी रहे और युवा

टीम वर्क की सफलता
किसी भी बड़े आयोजन के पीछे एक मजबूत टीम होती है। इस भव्य उत्सव को सफल बनाने में राहुल कुमार के साथ उनके सहयोगी विशाल, वैष्णवी, मनीष, विकास, पंकज और जिशु रात-दिन जुटे हुए हैं। इनकी सामूहिक मेहनत का ही परिणाम है कि आज शास्त्री नगर की यह गली ज्ञान, कला और संस्कृति के संगम के रूप में पूरे जिले में चर्चित है।
कला और आस्था का अद्भुत मेल
मुजफ्फरपुर की यह सरस्वती पूजा हमें सिखाती है कि जब आस्था के साथ कला का मेल होता है, तो वह ‘साधना’ बन जाती है। यदि आप भी बंगाल की सांस्कृतिक खुशबू और माँ सरस्वती के दिव्य स्वरूप का दर्शन करना चाहते हैं, तो शास्त्री नगर की इस चित्रगुप्त मंदिर वाली गली में एक बार जरूर आएं।