शिक्षा विभाग की सुस्ती या तकनीकी खामी? हज़ारों बच्चों के वजूद पर संकट।
मुख्य बिंदु:
- शैक्षणिक सत्र समाप्त होने के करीब, डेटा एंट्री का काम अब भी अधूरा।
- बिना यू-डायस (U-DISE) प्रविष्टि के सरकारी योजनाओं से वंचित हो सकते हैं छात्र।
- निजी और सरकारी स्कूलों के बीच समन्वय की कमी आई सामने।
- शिक्षा अधिकारियों ने जारी किया सख्त अल्टीमेटम।

प्रस्तावना: डिजिटल रिकॉर्ड से गायब हज़ारों चेहरे
साल 2025 अपने अंतिम पड़ाव पर है, लेकिन शिक्षा विभाग के आंकड़ों की दुनिया में अभी भी एक बड़ा शून्य नजर आ रहा है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जिले के लगभग 11,288 बच्चों की जानकारी अब तक यू-डायस (Unified District Information System for Education) पोर्टल पर दर्ज नहीं की जा सकी है। यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि उन 11 हजार से अधिक बच्चों का भविष्य है, जो कागजों पर ‘अदृश्य’ बने हुए हैं।
यू-डायस पोर्टल क्यों है महत्वपूर्ण?
यू-डायस पोर्टल भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की एक ऐसी प्रणाली है, जिसके आधार पर देश के हर बच्चे का ट्रैक रिकॉर्ड रखा जाता है। जब तक किसी बच्चे का डेटा इस पोर्टल पर अपडेट नहीं होता, तब तक उसे निम्नलिखित लाभों से हाथ धोना पड़ सकता है:
- डीबीटी (DBT) का लाभ: ड्रेस, किताब और छात्रवृत्ति का पैसा सीधे खाते में नहीं पहुंच पाएगा।
- बोर्ड परीक्षा में समस्या: नौवीं और दसवीं कक्षा के छात्रों के लिए यू-डायस आईडी अनिवार्य है।
- स्कूल स्थानांतरण (SLC/TC): बिना ऑनलाइन रिकॉर्ड के एक स्कूल से दूसरे स्कूल में दाखिला लेना असंभव हो जाएगा।
- मिड-डे मील योजना: बजट का निर्धारण छात्र संख्या के आधार पर होता है, डेटा कम होने से बजट प्रभावित होगा।
अधिकारियों की सख्त चेतावनी और कार्रवाई
शिक्षा विभाग के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी प्रखंड शिक्षा अधिकारियों (BEOs) और स्कूल संचालकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
“यह बेहद लापरवाही का मामला है। साल खत्म होने को है और अगर इन बच्चों की एंट्री नहीं हुई, तो इसके लिए संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापक और क्लर्क सीधे तौर पर जिम्मेदार होंगे। हम उनकी सैलरी रोकने पर भी विचार कर रहे हैं।”
— (जिला शिक्षा अधिकारी)

डेटा एंट्री में देरी के मुख्य कारण
जांच में यह बात सामने आई है कि देरी के पीछे कई कारण हैं:
- निजी स्कूलों की मनमानी: कई निजी स्कूल छात्र संख्या छिपाते हैं या पोर्टल पर डेटा अपडेट करने में रुचि नहीं दिखाते।
- आधार कार्ड की समस्या: बड़ी संख्या में बच्चों के आधार कार्ड उनके प्रोफाइल से लिंक नहीं हैं या उनमें त्रुटियां हैं।
- सर्वर की धीमी गति: अंतिम समय में लोड बढ़ने के कारण पोर्टल का सर्वर अक्सर धीमा हो जाता है।
- जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावकों को यह नहीं पता कि ऑनलाइन एंट्री न होने से उनके बच्चे का साल बर्बाद हो सकता है।
अभिभावकों और छात्रों पर प्रभाव
एक तरफ प्रशासन आंकड़ों की बाजीगरी में लगा है, वहीं दूसरी तरफ अभिभावकों में डर का माहौल है। कई छात्रों का कहना है कि उन्हें डर है कि कहीं उनका नाम पोर्टल पर न होने के कारण उन्हें आगामी परीक्षाओं से वंचित न कर दिया जाए। यदि 31 दिसंबर तक यह कार्य पूरा नहीं होता, तो इन बच्चों का डेटा ‘ड्रॉप बॉक्स’ में चला जाएगा, जिसे दोबारा सक्रिय करना एक जटिल प्रक्रिया है।
समाधान की राह: अब आगे क्या?
विभाग ने अब ‘मिशन मोड’ में काम करने का निर्णय लिया है:
- विशेष शिविर: स्कूलों में विशेष कैंप लगाकर बच्चों के आधार सुधार और डेटा एंट्री का काम किया जाएगा।
- साप्ताहिक समीक्षा: हर शनिवार को ब्लॉक स्तर पर प्रगति रिपोर्ट की समीक्षा होगी।
- नोडल अधिकारियों की नियुक्ति: हर 10 स्कूलों पर एक नोडल अधिकारी नजर रखेगा।
निष्कर्ष
11,288 बच्चों का भविष्य अब समय के साथ दौड़ लगा रहा है। यदि विभाग और स्कूल प्रबंधन ने समय रहते इस तकनीकी और प्रशासनिक खाई को नहीं भरा, तो शिक्षा के अधिकार (RTE) का सपना अधूरा रह जाएगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा डिजिटल इंडिया की इस दौड़ में पीछे न छूट जाए।