नई दिल्ली :- भारत में ‘आरक्षण’ केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनरल (अनारक्षित) कैटेगरी को लेकर दी गई व्याख्या ने देश की भर्ती व्यवस्था में एक नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि “जनरल कैटेगरी किसी खास वर्ग का कोटा नहीं है, बल्कि यह वह खुला आसमान है जहाँ योग्यता (Merit) रखने वाला कोई भी व्यक्ति उड़ान भर सकता है।”
इस विस्तृत रिपोर्ट में हम समझेंगे कि आरक्षण की पेचीदगियां क्या हैं, कोर्ट के फैसले का असल प्रभाव क्या होगा और भारतीय संविधान इस बारे में क्या कहता है।
1. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘ओपन कैटेगरी’ वास्तव में किसके लिए?
अक्सर आम धारणा यह रही है कि जनरल कैटेगरी की सीटें केवल ‘सवर्ण’ या ‘गैर-आरक्षित’ वर्गों के लिए होती हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया है।
फैसले का मुख्य सार:
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) यह सुनिश्चित करते हैं कि चयन प्रक्रिया केवल योग्यता पर आधारित हो। यदि एक SC, ST या OBC वर्ग का अभ्यर्थी अपनी मेहनत और योग्यता के दम पर जनरल कैटेगरी के कट-ऑफ नंबरों को पार करता है, तो उसे ‘जनरल’ सीट पर ही नियुक्त किया जाना चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणी: “आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को केवल इसलिए ओपन कैटेगरी से बाहर नहीं रखा जा सकता क्योंकि उसने अपनी पहचान एक विशेष वर्ग के रूप में बताई है। यदि उसके अंक पर्याप्त हैं, तो वह सामान्य सूची का हिस्सा है।”

2. आरक्षण का संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15 और 16 की भूमिका
भारतीय संविधान सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है। आरक्षण की व्यवस्था को मजबूती देने के लिए संविधान में मुख्य रूप से दो स्तंभ हैं:
- अनुच्छेद 15(4) और 15(5): ये धाराएं राज्य को अधिकार देती हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों (SC, ST, OBC) और अब EWS के लिए शैक्षणिक संस्थानों में विशेष प्रावधान या आरक्षण कर सके।
- अनुच्छेद 16(4): यह सार्वजनिक नियुक्तियों (सरकारी नौकरियों) में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने का आधार प्रदान करता है।
- 103वां संशोधन (2019): इसने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण का रास्ता साफ किया, जिसे ‘सवर्ण आरक्षण’ के नाम से भी जाना जाता है।
3. आरक्षण का गणित: वर्टिकल बनाम हॉरिजॉन्टल
भारत में आरक्षण की व्यवस्था को दो श्रेणियों में बांटा गया है, जिसे समझना हर उम्मीदवार के लिए अनिवार्य है।
A. वर्टिकल आरक्षण (Vertical Reservation)
यह मुख्य श्रेणियों को दिया जाने वाला आरक्षण है। केंद्र सरकार की नौकरियों में इसका वितरण इस प्रकार है:
- SC (अनुसूचित जाति): 15%
- ST (अनुसूचित जनजाति): 7.5%
- OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग): 27%
- EWS (आर्थिक पिछड़ा वर्ग): 10%
B. हॉरिजॉन्टल आरक्षण (Horizontal Reservation)
यह आरक्षण की ‘इंटर-लॉकिंग’ व्यवस्था है। इसके तहत महिलाओं, दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों और स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों को आरक्षण मिलता है। यह वर्टिकल कैटेगरी के भीतर ही लागू होता है। उदाहरण के लिए, यदि OBC के लिए 100 सीटें हैं, तो हॉरिजॉन्टल आरक्षण के तहत कुछ सीटें OBC महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
4. योग्यता बनाम लाभ: कब मिलेगी जनरल सीट?
सरकार और कार्मिक मंत्रालय (DoPT) के नियमों के अनुसार, आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी ‘जनरल’ सीट तभी ले सकता है जब उसने कोई भी विशेष रियायत न ली हो।
| स्थिति | चयन की कैटेगरी |
| अभ्यर्थी ने उम्र, फीस या अनुभव में कोई छूट नहीं ली और नंबर जनरल कट-ऑफ से ज्यादा हैं | जनरल/ओपन कैटेगरी |
| अभ्यर्थी ने उम्र में छूट ली है (जैसे 5 साल की रियायत) और नंबर जनरल कट-ऑफ से ज्यादा हैं | अपनी आरक्षित कैटेगरी (SC/ST/OBC) |
यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि जनरल कैटेगरी की प्रतिस्पर्धा का स्तर समान बना रहे।
5. 50% की सीमा: इंदिरा साहनी केस की विरासत
1992 का इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामला आरक्षण के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है। 9 जजों की बेंच ने निम्नलिखित ऐतिहासिक निर्देश दिए थे:
- कैप (Limit): आरक्षण किसी भी परिस्थिति में 50% से अधिक नहीं होना चाहिए।
- क्रीमी लेयर: OBC वर्ग के भीतर संपन्न लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का आदेश।
- पदोन्नति (Promotion): शुरू में कहा गया कि प्रमोशन में आरक्षण नहीं होगा, लेकिन बाद में संवैधानिक संशोधनों के जरिए इसमें बदलाव किए गए।
6. तमिलनाडु और 9वीं अनुसूची का विवाद
भारत में केवल तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहाँ आरक्षण की सीमा 69% है। इसका कारण यह है कि तमिलनाडु के आरक्षण कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में डाल दिया गया है।
- 9वीं अनुसूची के कानून को सामान्यतः कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- हालांकि, केशवानंद भारती केस (1973) के बाद कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कानून ‘संविधान के मूल ढांचे’ का उल्लंघन करता है, तो उसकी समीक्षा हो सकती है।
7. क्या आरक्षण एक मौलिक अधिकार है?
यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर अक्सर भ्रम रहता है। जून 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि:
“आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है।”
इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति कोर्ट जाकर यह मांग नहीं कर सकता कि “आरक्षण देना राज्य की संवैधानिक मजबूरी है”। राज्य (सरकार) अपनी सुविधा और आंकड़ों के आधार पर यह तय करती है कि किसे और कितना आरक्षण देना है। मौलिक अधिकार वे हैं जो व्यक्ति को जन्मजात या नागरिक होने के नाते मिलते हैं (जैसे समानता या स्वतंत्रता), जबकि आरक्षण एक ‘सकारात्मक पहल’ (Affirmative Action) है।
भविष्य की राह
सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण कि “ओपन कैटेगरी सभी के लिए है”, भारत में ‘मेरिटोक्रेसी’ और ‘सोशल जस्टिस’ के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्र अपनी मेहनत से आगे बढ़ें और उनकी अपनी कैटेगरी की सीटें उन लोगों को मिलें जो सामाजिक पायदान पर उनसे पीछे रह गए हैं।
देश के युवाओं के लिए संदेश साफ है—आरक्षण एक सुरक्षा कवच है, लेकिन योग्यता (Merit) वह चाबी है जो हर दरवाजा खोल सकती है।