प्रयागराज: संगम की रेती पर लगने वाला माघ मेला केवल आस्था और अध्यात्म का केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और कड़ी मेहनत की ऐसी कहानियों का भी साक्षी बन रहा है जो आधुनिक युग के युवाओं के लिए एक बड़ा सबक हैं। इन दिनों सोशल मीडिया पर गाजीपुर की दो बहनों, पारो और अदिति का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने अपने देसी कारोबार से होने वाली कमाई का ऐसा खुलासा किया है कि सुनने वाले दंग रह गए।
1. बेरोजगारी के दौर में आत्मनिर्भरता की नई इबारत
आज के समय में जब महंगाई और बेरोजगारी को लेकर हर तरफ चर्चा होती है, गाजीपुर की इन दो सगी बहनों ने साबित कर दिया है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। माघ मेले में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच ये बहनें ‘दातून’ (नीम और करंज की टहनियां) बेच रही हैं। उन्होंने बताया कि उनकी दातून की मांग इतनी अधिक है कि वे प्रतिदिन ₹10,000 से लेकर ₹20,000 तक की बिक्री कर रही हैं।
2. क्यों है दातून की इतनी भारी मांग?
माघ मेले में देश-दुनिया से श्रद्धालु आते हैं, जिन्हें ‘कल्पवासी’ कहा जाता है। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु सात्विक जीवन जीते हैं और प्रकृति के करीब रहते हैं। ऐसे में टूथपेस्ट और ब्रश की जगह नीम या करंज की दातून का उपयोग करना उनकी परंपरा और स्वास्थ्य दोनों के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। बहनों ने बताया:
- 24 घंटे बाजार: मेले में भीड़ रात-दिन रहती है, इसलिए उनकी बिक्री कभी नहीं रुकती।
- देसी विश्वास: लोग आज भी मसूड़ों और दांतों की मजबूती के लिए दातून को प्राथमिकता देते हैं।
- किफायती और शुद्ध: यह पूरी तरह प्राकृतिक है, जिससे श्रद्धालुओं का जुड़ाव अधिक रहता है।
3. वायरल वीडियो और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया
सौरभ मारवाड़ी नामक एक्स (Twitter) हैंडल से शेयर किए गए इस वीडियो को अब तक लाखों लोग देख चुके हैं। वीडियो में पारो और अदिति का आत्मविश्वास देखने लायक है। जब उनसे उनकी कमाई के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बेझिझक बताया कि वे सुबह से ही ₹10,000 का आंकड़ा पार कर चुकी हैं।

यूजर्स के कुछ प्रमुख कमेंट्स:
“मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। ये बहनें उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो घर बैठकर काम का इंतजार करते हैं।” “माघ मेला केवल पुण्य कमाने की जगह नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया भी है।”
4. मेहनत और जज्बे की कहानी
पारो और अदिति गाजीपुर से प्रयागराज सिर्फ इसलिए आईं ताकि वे इस मेले के अवसर का लाभ उठा सकें। वे दिन-भर घूम-घूम कर दातून बेचती हैं। उनका कहना है कि कड़ी धूप और भारी भीड़ के बावजूद उनका हौसला कम नहीं होता, क्योंकि उनकी मेहनत का फल उन्हें अच्छी कमाई के रूप में मिल रहा है।
5. निष्कर्ष: युवाओं के लिए एक संदेश
यह खबर हमें सिखाती है कि यदि आपके पास हुनर है और आप मेहनत करने से पीछे नहीं हटते, तो सफलता आपके कदम चूमेगी। ₹10,000 की दैनिक कमाई किसी बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस की सैलरी से भी ज्यादा हो सकती है। इन बहनों ने ‘वोकल फॉर लोकल’ के नारे को जमीन पर सच कर दिखाया है।